चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामलों के तेजी से बढ़ते बोझ को देखते हुए आदेश दिया कि इन मामलों में आरोपी को समन तामील होते ही ट्रायल कोर्ट को मामला मध्यस्थता (मीडिएशन) के लिए भेजना होगा। कोर्ट ने कहा कि “जब आप किसी खाई के किनारे खड़े हों तो कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए एक कदम पीछे लेना भी जरूरी होता है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में राज्य को सामान्यतः पक्षकार बनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह मूल रूप से निजी विवाद होते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था, विशेषकर यूपीआई, की भारी सफलता के बावजूद भारत में अभी भी कागजी चेक प्रणाली जारी है, जबकि कई देशों में इसे समाप्त कर दिया गया है। चेक बाउंस मामलों का प्रमुख उद्देश्य आरोपी को दंडित करना नहीं बल्कि चेक धारक को उसकी राशि और मुआवजा दिलाना है, जिसे बातचीत और समझौते के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से हासिल किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि
सभी ट्रायल कोर्ट (सीजेएम/जेएमएफसी) नए मामलों में आरोपी को समन मिलने के तुरंत बाद केस को मेडिएशन के लिए भेजें। जिन मामलों को अब तक मीडिएशन में नहीं भेजा गया है, उन्हें भी भेजा जाए। इसी तरह सेशन अदालतें भी लंबित अपील व रिवीजन मामलों में विपक्षी पक्ष को नोटिस मिलने के बाद उन्हें मेडिएशन के लिए भेजें। अदालत ने कहा कि मेडिएशन से इनकार करने का अधिकार पक्षकारों के पास रहेगा, लेकिन यह निर्णय उन्हें मेडिएटर के समक्ष लेना होगा। हाईकोर्ट ने कहा कि चेक बाउंस से जुड़े मामलों की बड़ी संख्या आपराधिक अदालतों पर भारी बोझ बन चुकी है।
अदालत लुधियाना की अदालत के आदेश को चुनौती देने वाली एक रिवीजन याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामला करीब 19.49 लाख रुपये के चेक बाउंस से जुड़ा था। आरोपी ने ट्रायल के अंतिम चरण में हस्तलेखन विशेषज्ञ से जांच कराने की मांग की थी, जिसे ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरोपी को पहले ही 15 मौके दिए जा चुके हैं और यह आवेदन मुकदमे में देरी के लिए किया गया है।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए रिवीजन याचिका खारिज कर दी।
