मुख्यमंत्री से सर्वदलीय वित्तीय चर्चा करवाने की मांग
विधायकों की वित्तीय निगरानी समिति बनाने का प्रस्ताव
चंडीगढ़। पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने पंजाब की वित्तीय स्थिति पर कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (कैग) की हालिया रिपोर्ट को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी (आप) सरकार में लगातार पंजाब कर्ज में डूबता जा रहा है। सरकार आय के साधन पैदा करने में असफल रही है। हर साल पंजाब का घाटा बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि 2019-20 में निवर्तमान कांग्रेस सरकार के कार्यकाल और 2023-24 तक प्रदेश का वित्तीय घाटा दोगुणा हो गया है। वहीं, सब्सिडी का खर्च भी दो गुणा पहुंच गया है। रंधावा ने मुख्यमंत्री भगवंत मान से सर्वदलीय वित्तीय चर्चा करवाने की अपील की। इसके साथ ही विधायी वित्तीय निगरानी समिति बनाने का प्रस्ताव रखने का सुझाव भी दिया।
उन्होंने कहा कि ऑडिट टिप्पणियों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे प्रणालीगत सुधारों के लिए चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। कैग की रिपोर्ट केवल किसी एक सरकार की आलोचना नहीं है, बल्कि यह पंजाब के वित्तीय प्रबंधन में लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक कमजोरियों का आईना है। रंधावा ने कहा कि वर्तमान वित्तीय दबाव के लिए लगातार आई सरकारें जिम्मेदार रही हैं और भविष्य में ऐसी चूक को रोकने के लिए संस्थागत जवाबदेही तंत्र की आवश्यकता है। उन्होंने कर्ज, व्यय की गुणवत्ता और फंड उपयोग की निगरानी के लिए सभी दलों के सदस्यों को शामिल करते हुए विधायकों की वित्तीय निगरानी समिति बनाने का प्रस्ताव रखा।
क्या कहती कैग की रिपोर्ट
रंधावा ने कहा कि कैग की रिपोर्ट से साफ है कि 2019-20 में वित्तीय घाटा 14285 करोड़ रुपए था, जो 2023-24 में बढ़कर 28,215 करोड़ तक पहुंच गया। इसी समय के दौरान पंजाब का कर्ज 1.62 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2.08 करोड़ रुपए हो गया था, जो अब मौजूदा साल में 4.17 लाख करोड़ रुपए पहुंच चुका है। उन्होंने कहा कि पंजाब में दी जा रही सब्सिडी पंजाब के फाइनेंस का मेजर प्रेशर प्वाइंट है। 2019-20 से 2023-24 में सब्सिडी डबल हुई है और 10,161 करोड़ से बढ़कर 18,770 करोड़ रुपए पहुंच गई है। इस पूरी सब्सिडी में कुल 92 और 99 फीसदी सब्सिडी बिजली पर दी गई है। इतना ही नहीं ब्याज भुगतान, वेतन और पैंशन रेवेन्यू खर्च भी काफी बढ़ा है, जोकि 75,860 करोड़ से बढ़कर 1.17 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह कुल खर्च का 80 से 96 फीसदी है।
