डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान ने भारत की एकता, अखंडता को किया मज़बूत : नायब सिंह सैनी

पठानकोट में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती समारोह में हिस्सा लेने पहुंचे मुख्यमंत्री

चंडीगढ़। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा बलिदान दिया। उन्होंने जो आवाज़ उठाई और जो सपना देखा, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाकर पूरा किया है। आज, भारतीय तिरंगा कश्मीर से कन्याकुमारी तक शान से लहरा रहा है। नायब सिंह सैनी रविवार को पंजाब के पठानकोट में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के मौके पर बोल रहे थे। इस मौके पर पठानकोट के विधायक अश्विनी शर्मा, पंजाब विधानसभा के पूर्व डिप्टी स्पीकर दिनेश बब्बू, पूर्व विधायक सीमा कुमारी भी मौजूद रहे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इतिहास कुछ खास शख्सियतों को सिर्फ़ किताबों से नहीं,बल्कि उन पीढ़ियों से याद रखता है जो उनके आदर्शों को जीवन में अपनाती हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही दूर की सोचने वाले नेता थे जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी भारत की एकता, अखंडता, आत्म-सम्मान और राष्ट्रीय चेतना के लिए लगा दी। वे अपने समय के न सिर्फ नेता थे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक भी थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी जी एक प्रसिद्ध शिक्षाविद होने के साथ साथ एक प्रखर राजनेता भी थे। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ 33 साल की उम्र में ही वे कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर बन गए। बंगाल के लोग उन्हें बहुत सम्मान और प्यार देते थे और उन्हें “बंगाल का टाइगर” कहते थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का लक्ष्य मज़बूत और आत्मनिर्भर भारत बनाना था। इसी मकसद से वे जनता के बीच आए और आज़ाद भारत के पहले उद्योग मंत्री बने। लेकिन 1950 में जब उसूलों और पावर को चुनने का मौका मिला, तो उन्होंने पद के बजाय देश हित को चुना। उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान से लाखों हिंदुओं और सिखों के निकाले जाने और लियाकत-नेहरू समझौते पर गहरी असहमति जताई और केन्द्रीय कैबिनेट से इस्तीफ़ा दे दिया। इस फ़ैसले से उन्होंने साबित कर दिया कि देश उनके लिए किसी भी पद से ज़्यादा ज़रूरी था। उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नारा दिया था, “एक देश में दो विधान,दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।” यह सिर्फ़ एक राजनेतिक नारा नहीं था,बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ थी। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को भारत में पूरी तरह मिलाने के लिए संघर्ष किया और बिना परमिट के इस इलाके में आने का निर्णय लिया। उन्हें माधोपुर से जम्मू और कश्मीर में प्रवेश करते समय गिरफ्तार किया गया। उस समय पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी उनके साथ थे। बाद में हिरासत में रहते हुए डॉ. मुखर्जी का निधन हो गया। यह कोई साधारण मृत्यु नहीं थी बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए किया गया सर्वोच्च बलिदान था।

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