जसवंत सिंह खालड़ा के हत्यारों को 1997 में शिअद सरकार आने के बाद दोषी ठहराया गया : सुखबीर बादल

कहा- शिअद सरकार ने आरोपी पुलिस अफसरों के खिलाफ एकमात्र गवाह को बयान दर्ज कराने का मौका दिया
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने हत्यारों को रिहा करने की पूरी कोशिश की और वे इसमें सफल भी हो गए

चंडीगढ़। शिरोमणी अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने आज दावा किया कि शहीद जसवंत सिंह खालड़ा के हत्यारों को 1997 में प्रकाश सिंह बादल के सत्ता संभालने के बाद ही दोषी ठहराया गया और मामले के एकमात्र गवाह- एसपीओ कुलदीप सिंह बचड़ा को पुलिस सुरक्षा प्रदान करके बयान देने की सुविधा दी गई, जिसके कारण आरोपी पुलिस अधिकारियों को जेल की सजा हुई।
यहां एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए सुखबीर बादल ने कहा कि इस मामले में पार्टी को बदनाम करने के लिए जानबूझकर गलत सूचना अभियान चलाया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि SAD ने ही जसंवत सिंह खालड़ा के हत्यारों को दोषी ठहराने की परिस्थितयां पैदा की थी। उन्होने कहा,‘‘ कांग्रेस कार्यकाल के दौरान एकमात्र गवाह बचड़ा राजनीतिक और पुलिस प्रशासन दोनों के भारी दबाव के कारण अपना बयान दर्ज कराने के लिए आगे नहीं आए थे। हालांकि जब अकाली दल ने उनका समर्थन किया और शिरोमणी कमेटी ने उन्हें कानूनी और आर्थिक मदद की तो उन्होने अदालत में अपना बयान दर्ज कराने का साहस जुटाया।’’ उन्होंने यह भी बताया कि बचड़ा के परिवार को एसजीपीसी ने नौकरी भी दी थी।
बादल ने कहा,‘‘खालड़ा अकाली दल की मानवाधिकार शाखा के जनरल सचिव थे। उन्होंने इस बात का खुलासा किया कि किस तरह से बेअंत सिंह सरकार हजारों सिख नौजवानों को फर्जी मुठभेड़ में मारने के बाद उनकी लावारिस शवों का को जलाकर तथ्य खत्म कर रही थी। चूंकि कांग्रेस सरकार को उनका इस संबंध में अस्पतालों और श्मशान घाटों पर जाना पंसद नही था इसीलिए उनका अपहरण कर उनकी हत्या कर दी गई।’’ अकाली दल अध्यक्ष ने खुलासा करते हुए बताया कि खालड़ा के अपहरण का मुददा तुरंत उठाया था और कहा,‘‘ एसजीपीसी ने राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट में पत्र लिखा था, तत्कालीन पार्टी नेता मनप्रीत सिंह बादल ने विधानसभा में यह मुददा उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने एसजीपीसी के अभ्यावेदन को बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के रूप में लिया और सीबीआई को मामले की जांच करने का निर्देश दिया, जिसके कारण आरोपी पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई।’’
सुखबीर बादल ने कहा कि इसे ठीक विपरीत पूर्ववर्ती कांग्रेस और मौजूदा आम आदमी पार्टी ने खालड़ा के हत्यारों को रिहा कराने की पूरी कोशिश की और वे इस मकसद में सफल भी हुए। उन्होंने कहा कि 2017 में कांग्रेस सरकार ने एक आवेदन के माध्यम से दोषियों को रिहाई की सुविधा प्रदान की, जिसमें उन्हें आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वालों के रूप में चित्रित किया गया। उन्होंने कहा कि जब यह कोशिश नाकाम हो गई तो पूर्व गृह मंत्री सुखजिंदर रंधावा ने भी उनकी रिहाई के लिए मामला आगे बढ़ाया था। उन्होंने कहा,‘‘आम आदमी पार्टी की सरकार को एहसास हुआ कि सीबीआई द्वारा अभ्यावेदन का लगातार विरोध किया जा रहा है। उसके बाद आप की सरकार ने अपनी रणनीति बदली और उस फैसले का फायदा उठाया, जिसमें कहा गया था कि आरोपी डीएसपी जसपाल सिंह की समय से पहले रिहाई के आवेदन पर कोई फैसला नहीं लिया जाता है तो जसपाल सिंह को जमानत दी जा सकती है। चूंकि आम आदमी पार्टी सरकार ने जानबूझकर दो साल तक आवेदन पर कोई फैसला नहीं लिया, इसीलए खालड़ा के हत्यारे को समय से पहले रिहाई के लिए आवेदन करने के कुछ ही दिनों के अंदर 2023 में रिहा कर दिया गया।’’ उन्होंने कहा कि इसी तरह एसएचओ सतनाम सिंह को 2021 में कांग्रेस सरकार द्वारा पेरोल दी गई और उसके बाद वह लापता हो गए थे, जिसके बाद 2022 में आप सरकार के कार्यकाल के दौरान उनके वकील ने उच्च न्यायालय में यह दलील दी थी कि राज्य उनकी रिहाई का समर्थन कर रहा है।

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